रांची में छात्रों का उबाल, सरकार पर कड़े सवाल।

सड़कों पर सपने, मेज पर फाइलें: रांची में युवाओं के हुंकार ने खोली व्यवस्था की पोल। झारखंड की राजधानी रांची का जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम और अल्बर्ट एक्का चौक इन दिनों केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि राज्य के लाखों युवाओं के टूटते सब्र और उबलते गुस्से का प्रतीक बन चुका है। जो हाथ किताबों के पन्ने पलटते थे, वे आज तख्तियां थामे सड़कों पर हैं; जो युवा लैंप पोस्ट की रोशनी में अफसर बनने के सपने बुनते थे, वे आज राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था के अंधियारे के खिलाफ हुंकार भर रहे हैं। जेपीएससी और जेएसएससी भर्ती परीक्षाओं में हुई कथित धांधली, अनियमितताओं और लीक संस्कृति के विरोध में चल रहा यह छात्र आंदोलन अब व्यापक रूप ले चुका है। सवाल यह नहीं है कि छात्र विरोध क्यों कर रहे हैं, सवाल यह है कि आखिर व्यवस्था को हर बार यह अहसास दिलाने के लिए युवाओं को भूख हड़ताल पर क्यों बैठना पड़ता है?
झारखंड में भर्ती परीक्षाओं की कहानी अब एक तयशुदा पटकथा जैसी बन गई है—विज्ञापन जारी होना, तारीखें टलना, परीक्षा आयोजित होना, और फिर धांधली व पर्चा लीक के आरोपों के साथ मामला कोर्ट या जांच एजेंसियों के चक्कर काटना। 14वीं जेपीएससी प्रारंभिक परीक्षा के परिणामों को लेकर जिस तरह की अपारदर्शिता और अनियमितताओं के आरोप लगे हैं, उसने राज्य की परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को एक बार फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है। सड़कों पर खड़े युवाओं के तंज और नारे व्यवस्था पर करारा प्रहार करते हैं: मेहनत हम करें, और नौकरी कोई और ले जाए—यह कैसा सिस्टम है? जब परीक्षा का परिणाम जारी होने से पहले ही ओएमआर शीट और पेपर लीक की खबरें सामने आने लगें, तो इसे केवल तकनीकी खामी कहकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता। यह एक गहरे पैठे भ्रष्टाचार के सिंडिकेट की ओर इशारा करता है, जिसे उखाड़ने के लिए कागजी जांच नहीं, बल्कि ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है।
राज्य सरकार का दावा है कि वह युवाओं के प्रति संवेदनशील है और हर मामले की निष्पक्ष जांच करा रही है। सीआईडी जांच के आदेश दिए गए हैं, कुछ गिरफ्तारियां भी हुई हैं, और शिकायतों के लिए ईमेल आईडी जारी कर दी गई है। लेकिन जरा सोचिए, जिस अभ्यर्थी ने सालों तक पाई-पाई जोड़कर तैयारी की हो, जिसके माता-पिता ने पढ़ाई के खर्च के लिए अपनी जमीन या मवेशी तक बेच दिए हों, क्या उसके लिए एक ईमेल आईडी जारी कर देना काफी है?
छात्रों की मांग सीधी है—14वीं जेपीएससी पीटी परीक्षा को रद्द किया जाए और पूरे मामले की जांच सीबीआई या निष्पक्ष केंद्रीय एजेंसी से कराई जाए। लेकिन सरकार सीबीआई जांच की मांग पर कतराती नजर आती है। जब तंत्र को अपनी ही व्यवस्था पर पूरा भरोसा है, तो फिर एक पारदर्शी और स्वतंत्र जांच से परहेज क्यों? क्या यह वही रवैया नहीं है जहाँ समस्या को हल करने के बजाय उसे टालने और बैठकों के दौर में उलझाने की कोशिश की जाती है?
रांची की सड़कों पर आज कोई एक दल या नेता नहीं, बल्कि झारखंड का ‘भविष्य’ बैठा हुआ है। कई युवा नेता और छात्र दिनों से भूख हड़ताल पर हैं, कुछ की तबीयत बिगड़ रही है और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ रहा है। वॉटर कैनन, बैरिकेडिंग और पुलिस की सख्तियां युवाओं के जज्बे को डरा नहीं पा रही हैं।
यह आंदोलन केवल एक परीक्षा रद्द कराने की लड़ाई नहीं है; यह योग्यता और न्याय की रक्षा की लड़ाई है। यदि किसी राज्य में प्रतिभा के बजाय भ्रष्टाचार का बोलबाला हो जाए, तो वहाँ का युवा हताशा के गर्त में धकेला जाता है।
सत्ता में बैठे हुक्मरानों को यह समझना होगा कि युवा अब केवल वोट बैंक या खोखले चुनावी वादों के मोहरे नहीं हैं। अगर सरकार सचमुच युवाओं के प्रति गंभीर है, तो उसे अपनी कमियों को स्वीकारते हुए परीक्षा संस्थाओं में आमूलचूल सुधार करने होंगे, दोषियों पर सख्त नकेल कसनी होगी और छात्रों की जायज मांगों को तुरंत स्वीकार करना होगा। वर्ना रांची की सड़कों से उठी यह आवाज केवल विधानसभा के दरवाजों तक ही नहीं टकराएगी, बल्कि आने वाले समय में पूरी व्यवस्था के लिए एक कड़ा जन-आदेश बनकर उभरेगी।
