दो मासूम बेटों की हत्यारी मां की उम्रकैद बरकरार: झारखंड हाईकोर्ट ने खारिज की अपील, निचली अदालत का फैसला रखा कायम

रांची: झारखंड उच्च न्यायालय ने मातृत्व और मानवीय संवेदनाओं को शर्मसार कर देने वाले एक बेहद जघन्य हत्या मामले में ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने अपने दो मासूम बेटों की निर्मम हत्या करने वाली मां की अपील याचिका को खारिज करते हुए उसकी आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सजा को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ ने निचली अदालत के 2021 के फैसले को पूरी तरह से वैधानिक और तथ्यपरक मानते हुए उस पर अपनी मुहर लगा दी है।
न्यायालय ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट टिप्पणी की कि केस से जुड़े तमाम परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence) इस बात की ओर अटूट इशारा करते हैं कि मासूमों की हत्या इस महिला द्वारा ही की गई है। अदालत ने माना कि साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला इतनी मजबूत है कि इसमें किसी अन्य व्यक्ति द्वारा इस वारदात को अंजाम दिए जाने की रत्ती भर भी गुंजाइश या संभावना नहीं बचती।
क्या था पूरा मामला और जघन्य वारदात?
यह दिल दहला देने वाली घटना उस समय की है जब दोनों निष्पाप बच्चों की उम्र महज 4 साल और 2 साल थी। जिस मां की गोद में बच्चों को सबसे सुरक्षित महसूस करना चाहिए था, उसी मां ने अपने ही जिगर के टुकड़ों की जीवन-लीला समाप्त कर दी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, महिला का अपने पति के अलावा किसी अन्य व्यक्ति के साथ अवैध संबंध चल रहा था। आरोपी महिला उस व्यक्ति से शादी करना चाहती थी, लेकिन उसके दोनों मासूम बच्चे इस राह में रुकावट बन रहे थे।
इसी अंधी सनक और आपराधिक मानसिक षड्यंत्र के तहत महिला ने अपने ही बच्चों को रास्ते से हटाने की खौफनाक साजिश रची। उसने 4 साल और 2 साल के अबोध बेटों को जहर (विषाक्त पदार्थ) देकर मौत के घाट उतार दिया और उनके शवों को नाले में फेंक दिया।
निचली अदालत का फैसला और हाईकोर्ट का कड़ा रुख
साल 2021 में इस मामले की सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) ने साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के आधार पर महिला को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या) के तहत दोषी करार दिया था और उसे आजीवन कारावास तथा जुर्माने की सजा सुनाई थी।
इस फैसले को चुनौती देते हुए आरोपी महिला ने हाईकोर्ट में आपराधिक याचिका दायर की थी। उसकी ओर से दलील दी गई थी कि मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी (Eye-witness) नहीं है और उसे झूठा फंसाया गया है। हालांकि, हाईकोर्ट की खंडपीठ (जस्टिस रंगन मुखोपाध्याय एवं जस्टिस अरुण कुमार राय) ने बचाव पक्ष की दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य पूर्ण, सुसंगत और आपराधिक मंशा को साफ दर्शाते हैं। कोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि एक मां, जिसका काम अपने बच्चों की रक्षा करना होता है, उसने एक राक्षसी प्रवृत्ति का परिचय देते हुए उनका शिकार कर लिया।
कानूनी और सामाजिक पहलू
कानूनी जानकारों का मानना है कि ऐसे मामलों में जहां प्रत्यक्षदर्शी नहीं होते, वहां परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ियां (Chain of Events) सबसे अहम भूमिका निभाती हैं। मेडिकल रिपोर्ट, फॉरेंसिक जांच और बच्चों की मौत के समय व स्थान से जुड़ी कड़ियों ने महिला के खिलाफ जुर्म को साबित किया।
हाईकोर्ट के इस फैसले ने समाज में एक कड़ा संदेश दिया है कि अपराध चाहे कितना भी छिपाकर और सातिर तरीके से किया गया हो, कानून के लंबे हाथ से बचना नामुमकिन है। मातृत्व के रिश्ते को कलंकित करने वाले इस अपराध में उम्रकैद की सजा कायम रखकर अदालत ने पीड़िता आत्माओं और न्याय प्रणाली के प्रति जनता के विश्वास को पुनः सुदृढ़ किया है।